सहकारिता

प्रस्तावना : पैदा होते ही बच्चे :के अन्दर दूसरे बच्चे से हिलमिल कर रहने की पवित्र भावना स्वत: उत्पन्न होती है। कुछ बड़ा होकर बच्चा, इसी प्रवृत्ति के कारण अन्य दूसरे बच्चों के साथ खेल कर धूल-धूसरित होता है। यह उसके अन्दर अच्छी धारणा है ; किन्तु बड़ा होकर यही बच्चा व्यक्ति के रूप में परस्पर कलह करता है। इससे उसे संसार में भोगों का उपभोग करते हुए भी वह आनन्द नहीं प्राप्त होता है जो परस्पर मिल-बाँट कर खाने में आता था। मिल जुलकर खाने-पीने वाले व्रज के वैभव को पुन: प्राप्त करने के लिए और उद्धव से कहने लगे :
या मथुरा कांचन की नगरी, मनि मुकतमल जाहीं।।
जबहि सुरति वावति वा सुख की जिय उमगत तनु नाहीं।।

यह परस्पर मेल की भावना सहकारिता को जन्म देती है ।
सहकारिता का अर्थ : ‘सहकारिता’ शब्द सह+कार्य से बना है। सहकार्य का अर्थ है साथ-साथ कार्य करना। जब कुछ व्यक्ति किसी उद्देश्य से किसी कार्य को मिल-जुलकर करते हैं, तो उसे सहकार्य कहते हैं। प्राचीन काल में व्यक्ति स्वत: परिश्रम करके कमाता था और उसका उपयोग भी स्वयं ही करता था; किन्तु आधुनिक वैज्ञानिक युग में प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे पर आश्रित है। यह एक दूसरे का आश्रय कभी-कभी शोषण को बढ़ावा भी दे देता है। आज पूँजीपति हम सबका उपयोग कर मनमाना कमाते हैं और जनता का शोषण करते हैं। ऐसे शोषण से बचने का उपाय एकमात्र सहकारिता ही है जिसके आधार पर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं की जा सकती है। आज सहकारिता व्यवस्था की एक ऐसी विशेष प्रणाली है, जिसमें लोग स्वेच्छा से समानता के आधार पर किन्हीं निर्धारित अथवा विशिष्ट आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संगठित होते हैं। सहकारिता का लक्ष्य पारस्परिक सहयोग द्वारा व्यक्ति और समूह के लाभ एवं सुख समृद्धि में वृद्धि करना है।
सहकारी समितियों का गठन : सहकारी आन्दोलन का प्रारम्भ जर्मनी में हुआ था। वहाँ पर आर्थिक प्रगति तथा नियोजन के लिए पूर्ण प्रतियोगिता एवं असंगत मुनाफाखोरी से बचने के लिए नगर तथा ग्रामीण सहकारी समितियों की स्थापना की गई। सन् 1900 के लगभग भारत सरकार ने भी इस आन्दोलन को चलाना प्रारम्भ किया और इसके लिए पहला सरकारी अधिनियम पास किया । उस समय देश में 843 सहकारी समितियाँ बनीं। उन समितियों को पूँजी 24 लाख रुपए थी। 1911 ई० में इन समितियों की संख्या 8177 हो गई और पूँजी 2 करोड़ 36 लाख रुपया अनुमानित की गई। 1939 ई० में 11700 सहकारी समितियाँ थीं। 1945 ई० में इनकी संख्या 192170 हो गई।
स्वाधीनता प्राप्त करने के पश्चात् तो सहकारी आन्दोलन को और भी अधिक गति मिली। आज देश की सरकार का एकमात्र लक्ष्य सहकारिता ही हो गया है। आज देश भर में अगणित सहकारी समितियाँ कार्य कर रही हैं।
सहकारिता का महत्त्व : सहकारिता का आर्थिक जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है। सहकारिता की आवश्यकता दलाली प्रथा को समाप्त करने के लिए हुई। पूँजीवाद में शोषण होता है। यह पूँजीपति समाज के साधनों के स्वामी बन जाते हैं और निर्धन जनता के कार्य लेकर उन्हें अत्यल्प धन देकर स्वयं अधिक लाभ उठा कर मालामाल बन बैठते हैं। इसी को समाप्त करने हेतु सहकारी समितियों का गठन हुआ। इन समितियों में प्रत्येक कार्य करने वाले व्यक्ति को समान लाभ प्राप्त होगा। साधन-विहीन निर्धन शोषित व्यक्तियों तथा उपभोक्ताओं को पूँजीवाद के शोषण से रक्षा का एकमात्र मार्ग सहकारिता ही है।
सहकारिता से लाभ : सहकारिता के माध्यम से व्यक्तियों में परस्पर प्रेमसौहार्द, सहयोग, संगठन, आत्म-निर्भरता, पारस्परिक सहायता, त्याग एवं एकता की भावनाएँ जाग्रत होती हैं तथा उनमें आत्म-विश्वास उत्पन्न होता है। पूँजीवाद की भाँति सहकारिता में उत्पादन का ध्येय अधिकतम लाभ नहीं होता; अपितु सार्वजनिक लाभ की भावना निहित होती है। इस प्रकार सहकारी संगठनों और संस्थाओं में व्यक्तिगत लाभ की भावना का स्थान सार्वजनिक सेवा ग्रहण कर लेती है। सहकारिता के माध्यम से व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा करते हुए देश और समाज की आर्थिक समृद्धि एवं सार्वजनिक कल्याण में अत्यधिक वृद्धि लायी जा सकती है।
सहकारिता पूँजीवाद और समाजवाद का मध्य मार्ग है। इस प्रणाली द्वारा पूँजीवाद और समाजवाद दोनों के दोषों से बचा जा सकता है। इसमें उन दोनों व्यवस्थाओं के गुणों का समावेश रहता है। इसके द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थी को सीमित रखा जा सकता है और नौकरशाही को। समाप्त किया जा सकता है। इस प्रकार सहकारी व्यवस्था पूँजीवाद और समाजवाद प्रणालियों से अत्युत्तम है।
सहकारिता के विभिन्न रूप : आज की परिस्थितियों में सहकारिता । की आवश्यकता विशेष रूप से प्रतीत होती है। इन समितियों से प्रत्येक क्षेत्र में लाभ हो सकता है। कृषि क्षेत्र में सहकारिता के सहयोग से। खेतों के उपविभाजन और अपखंडन को रोका जा सकता है। खाद, बीज, सिंचाई, आधुनिक उपकरण, क्रय-विक्रय तथा अनुसंधान की सुचारु व्यवस्था की जा सकती है। सहकारिता द्वारा लघु एवं कुटीर उद्योगों का समुचित विकास संभव है। बैंक व्यापार तथा यातायात आदि के क्षेत्र में भी सहकारिता प्रणाली उपयुक्त सिद्ध हो रही है।
सरकार भी जनता के साथ इन समितियों में लाभ ले रही है। आज सरकार ने इन समितियों की सुविधा के लिए केन्द्र से सम्बन्धित 22 राज्य सहकारी बैंक, 449 केन्द्रीय बैंक तथा बैंक संघ, 126, 954 आरम्भिक ऋण समितियों, 10, 306 कृषि समितियों और 9 केन्द्रीय तथा 291 भूमि बन्धक बैंकों की स्थापना की है। ये समितियाँ आवश्यकता पड़ने पर रिजर्व बैंक से भी ऋण ले सकती हैं।
आज की इस महँगाई एवं मिलावट के युग में क्रय-विक्रय सम्बन्धी सहकारी समितियों से पर्याप्त सुविधा प्राप्त हो सकती है। यह बात स्वतः सिद्ध है कि आज विभिन्न प्रकार की स्थापित सहकारी समितियों से आर्थिक विकास में पर्याप्त सहायता प्राप्त होगी।
उपसंहार : आशा है कि सहकारिता भविष्य में एक सफल प्रणाली के रूप में प्रतिष्ठित होगी। इसमें पूर्ण साफल्य के लिए सरकार का सहकारी समितियों पर कठोर नियन्त्रण आवश्यक है।
कहा गया है कि- ‘बूंद-बूंद कर सागर भर जाता है और रिक्त भी हो जाता है। अत: भारतवासियो ! सहकारिता के अमृत समुद्र को बूंद-बूंद कर बहने न दो; अपितु आवश्यकता इस बात की है कि कटिबद्ध होकर बूंद-बूंद से सहकारिता के सागर को भर दो।

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