संयुक्त राष्ट्र संघ


प्रस्तावना : युद्ध ने सदैव विनाश का इतिहास लिखा है। युद्ध की भयंकर ज्वाला में सभ्यताएँ भस्म होती हैं, संस्कृतियाँ सिसकने लगती हैं और सत्य अपना मुँह छिपा लेता है। ललित कलाओं में सत्य, शिव और सौन्दर्य का लोप होता है तथा उनके स्थान पर दानवी घृणा का प्रचार ही उनका लक्ष्य बन जाता है। साहित्य प्रेम और सहानुभूति के प्रसार के स्थान पर राजनीति की मादकता के माया जाल में फंसकर जघन्य पापाचार का प्रचार करने लगता है।
शान्ति की खोज में मानव : विज्ञान के आधुनिक आविष्कारों ने जहाँ समय और स्थान की दूरी को समाप्त कर दिया है, वहाँ उसकी भयंकर शक्तियों ने उसे इतना शक्तिशाली बना दिया है कि उसकी ही सहायता से विश्व का विनाश कुछ ही क्षणों में किया जा सकता है। हीरोशिमा और नागासाकी की धराशायी अट्टालिकाएँ, स्त्रियों और बच्चों के विकृत रूप और विधुर एवं विधवाओं के करुण आँसू विज्ञान। ‘की ध्वंसकारी शक्ति का दृश्य उपस्थित करते हैं। नर-संहार और विध्वंस की वीभत्सता कल्पनातीत हो गई हैं। दो परमाणु बमों ने जापान के दो सुन्दर नगरों को समाप्त कर दिया एबीसीनिया में इटली ने विषैली गैसों का प्रयोग करके दिखा दिया कि पहाड़ों की । कन्दराओं में भी मानव विज्ञान की दानवता से सुरक्षित नहीं रहे। सकता। यही कारण है कि आज का मानव युद्ध की इस विभीषिका से बचना चाहता है। युद्ध सदैव सत्ताधारियों की लोलुप महत्त्वाकांक्षाओं का प्रतीक है, जनता या मानव समाज की आवश्यकता नहीं। अत: जन समाज सदैव उससे बचने का प्रयास करता रहेगा। यही कारण है। कि आज भी वह शान्ति के उपायों की खोज में है।
युद्ध की विभीषिकाएँ और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना : सन् 1939 में संसार द्वितीय महायुद्ध की विभीषिका से काँप गया। युद्ध की समाप्ति पर युद्ध के विरुद्ध पुन: प्रतिक्रिया हुई और विश्व के विचारकों ने पुन: शान्ति के लिए अपना दूसरा दृढ़ चरण आगे बढ़ाया। सानफ्रांसिस्को में विश्व के 50 राष्ट्रों ने मिलकर 26 जून 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की और पुरातन राष्ट्र संघ की कमियों को इस संगठन से दूर करने का प्रयास किया। इस समय इस संगठन ने अनुभव किया कि केवल राजनैतिक संघर्षों को निपटाने तक सीमित रहने से विश्व शान्ति कदापि नहीं हो सकती है। उसके लिये आर्थिक विषमताओं को भी विश्व से दूर करना होगा जो युद्ध का मूल कारण होती हैं। सभी देशों ने मिलकर युद्ध की निन्दा की और समानता के सिद्धान्त को स्वीकार किया। प्रत्येक राष्ट्र चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपने घरेलू मामलों में पूर्णतया स्वतन्त्र है। संघ के प्रथम अधिवेशन में ही प्रजातन्त्र शासन प्रणाली को सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली स्वीकार किया गया। द्वितीय युद्ध के जन्मदाता इटली और जर्मनी थे और वहाँ पर अधिनायक तन्त्रीय शासन प्रणाली थी जहाँ के शासकों को अपने राज्य की सीमा एवं गौरव बढ़ाने की प्यास थी।
संयुक्त राष्ट्र संघ का चतु:सूत्रीय कार्यक्रम : इन समस्त बातों को ध्यान में रखते हुये संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने समक्ष एक चतु:सूत्रीय कार्यक्रम रखा जिसके अनुसार :
(1) जाति और वर्ण आदि के भेद-भाव को दूर करने, प्रत्येक मानव को उसके मानवीय अधिकार एवं स्वाधीनता दिलाने का प्रयास किया जायेगा।
(2) मानव जीवन के स्तर को ऊंचा किया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति को जीविका के साधन उपलब्ध कराकर उसके लिये आर्थिक और सामाजिक विकास सम्भव बनाया जायेगा।
(3) विश्व के राष्ट्रों में परस्पर मैत्री और सद्भाव बढ़ाया जायेगा। उनके आपसी झगड़ों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने का प्रयत्न किया। जायेगा।
(4) पिछड़े हुए राष्ट्रों को संरक्षण में लेकर उनमें स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति की उन्नति की जायेगी ताकि वे स्वाधीनता के योग्य हो सकें।
संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न विभाग : उक्त समस्त कार्यक्रम को चलाने के लिए इसके छ: विभिन्न विभाग बनाये गये :
(1) साधारण सभा
(2) सुरक्षा परिषद्
(3) आर्थिक और सामाजिक परिषद्
(4) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय
(5) संरक्षण परिषद्
(6) संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान एवं संस्कृति परिषद्
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किए गए कार्य : संयुक्त राष्ट्र संघ ने गत वर्षों में अपनी स्थापना के उपरान्त अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं। उत्तर कोरिया के बंधन से दक्षिण कोरिया को मुक्त कराया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कई देशों की संयुक्त सेना बनाकर उत्तर कोरिया के आक्रमणों का मुकाबला किया। इस संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ही डच, इण्डोनेशिया, अरब, यहूदियों तथा मिस्र के झगड़ों का बड़ी सफलतापूर्वक निर्णय किया गया। अफ्रीका में होने वाले भारतीयों के प्रति दुर्व्यवहार को संयुक्त राष्ट्र संघ ने ही समाप्त कराया। इसमें कोई संदेह नहीं कि कश्मीर की।
समस्या को सुरक्षा परिषद् हल नहीं कर पाया। भारत पर चीन के आक्रमण को भी संयुक्त राष्ट्र संघ नहीं रोक सका और चीन के द्वारा छीनी गई। भारतीय भूमि को भी संयुक्त राष्ट्र संघ वापिस नहीं दिला पाया; क्योंकि चीन उस समय राष्ट्र संघ का सदस्य ही नहीं था।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सर्वत्र प्रचार : इतना सब होने पर भी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि संयुक्त राष्ट्र संघ निष्पक्षतापूर्ण कार्य करता रहा, तो विश्व के प्रत्येक कोने में इस धरा पर ही मानव अपने कल्पित स्वर्ग की सृष्टि कर लेगा, जहाँ प्रेम, सहयोग एवं सहानुभूति की त्रिवेणी लहराकर उसके हृदय में सौख्य का संचार कर देगी। विज्ञान के विकास ने मानव के लिये इस धरा को छोटा कर दिया और वह इस ब्रह्माण्ड के अन्य ग्रहों को भी अपने अधिकार की सीमा में बाँधने के लिये कटिबद्ध है। खेद तो केवल यह है कि आज उसका हृदय छोटा होता जा रहा है। इस समय समस्त विश्व दो गुटों में बँटा हुआ है, एक है पूँजीवादी और दूसरा है साम्यवादी। एक का नेतृत्व अमरीका कर रहा है और दूसरे का नेतृत्व रूस कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में इन दोनों गुटों का संघर्ष चलता है। संयुक्त राष्ट्र में देशों के प्रतिनिधि जनसंख्या के आधार पर न लिए जाकर प्रत्येक देश से एक प्रतिनिधि ही लिया जाता है। परिणामत: आज अमरीका समर्थक देशों की संख्या अधिक है और वह अपने विशेषाधिकार के बल पर कभी-कभी गलत बात को भी मनवा लेता है। अत: इस समय यह नितान्त आवश्यक है कि गुटबन्दी समाप्त हो; अन्यथा किसी भी दिन गत-राष्ट्र संघ की भाँति, यह भी इतिहास की स्मृति ही बनकर रह जायेगा।
उपसंहार : किन्तु जो भी हो, संयुक्त राष्ट्र संघ ने अब तक विश्व को युद्ध की विभीषिकाओं से बचाकर स्तुत्य कार्य किया है और करता रहेगा। भले ही कुछ लोग युद्ध को जीवन का आवश्यक अंग मानकर मत्स्य न्याय के आधार पर विश्व में तृतीय महायुद्ध का स्वप्न देखते हों; किन्तु ऐसा सही नहीं।  मानव जीवन जब तक पशुत्व की कोटि में रहता है तभी तक वह मत्स्य न्याय द्वारा प्रचलित होता है। आज का मानव विवेकशील प्राणी है। अनुभव से प्राप्त ज्ञान ही उसका विशेष गुण है। अत: आज उससे यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि वह युद्ध के भीषण परिणाम देखने के उपरान्त भी युद्ध की आकांक्षा कर सकता है। अत: आशा है कि यह संघ मानव हित सम्पादन में निश्चय रूप से सहायक सिद्ध होगा।

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