भारतीय संस्कृति और सभ्यता


प्रस्तावना : मानव-जीवन अनन्त, असीम और अपार है। इस आर-पार बसी धरती पर बसे छोटे-बड़े भू-भागों यानि देशों में अनन्त लोग निवास करते हैं। उन सभी के अपने-अपने रंग-रूप,खान-पान, रहन-सहन, उत्सव-त्योहार, रीति-रिवाज और परम्पराएँ वेश-भूषा ‘आदि तो हैं ही, अपनी-अपनी सभी प्रकार की विशेषताएँ और महत्त्व भी हैं। सामान्यतया भारत नामक भू-भाग और इस पर रहने वाले लोग उसी अनन्त-अपार का एक हिस्सा या अंग हैं, जिस के अपने अलग गुण-दोष, विशेषताएँ और महत्त्व हैं तथा हो सकता है सभी का एक बाह्य स्वरूप हुआ करता है और एक आन्तरिक। वास्तव में वही देश-काल के नाम-रूप से सभी को एक-दूसरे से अलग किया करता है। अलगाने वाले उन तत्त्वों को ही संस्कृति और सभ्यता कहते हैं।
संस्कृति और सभ्यता : ऊपर हमने अनन्त मानव-प्रवाह को। एक-दूसरे से अलग करने वाले आन्तरिक और बाह्य मुख्य दो तत्त्व माने हैं। उनमें से पहले यानि आन्तरिक तत्त्व का सम्बन्ध संस्कृति हुआ करता है या फिर आन्तरिक तत्त्वों को ही संस्कृति कहा जाता है। जबकि बाह्य तत्त्व को सभ्यता। संस्कृति सूक्ष्म तत्त्व है, सभ्यता स्थूल तत्त्व। पहला भावों, विचारों और उनके अनुरूप आचरणों से प्रकट हुआ करता है। जबकि दूसरा रहन-सहन, खान-पान और बाहरी व्यवहारों से उत्सव-त्योहार आदि आन्तरिक उल्लास को प्रकट किया करते हैं, साहित्य-कलाओं का सम्बन्ध भी अन्त:भावों से रहता है, धार्मिक आध्यात्मिक प्रक्रियाएँ भी (पूजा-पाठ आदि नहीं) अन्त: प्रेरित हुआ करती हैं; अत: इन सभी को संस्कृति का अंग माना जाता है। शेष जो कुछ भी प्रत्यक्ष एवं दृश्य क्रिया-व्यापार हैं, वेश-भूषा, खान-पान आदि हैं, उनको सभ्यता का अंग माना जाता है। यह तथ्य विशेष ध्यातव्य है कि संस्कृति के सूक्ष्म तत्त्व ही सभ्यता के स्थूल तत्त्वों-रूपों के निर्धारक हुआ करते हैं।
संस्कृति-सभ्यता का महत्त्व : इन दोनों तत्त्वों का महत्त्व इन्हें मानने वालों के अन्त:बाह्य स्वरूप, भावों, अस्मिता, अन्त:बाह्य शक्तियों, नीतियों-नैतिकताओं का स्वत: परिचय प्रदान करते रहने से ही प्रकट हुआ करता है। अपने अनुकर्ताओं के जीवन एवं विचारों आदि को युगानुकूल गतिशील बनाए रखने में भी संस्कृति-सभ्यता का महत्त्व देखा-परखा जाता है। इसी कारण तो सुसंस्कृत, सुसभ्य जैसे शब्द अस्तित्व में विशेषण बन कर आ पाए हैं। ध्यातव्य तथ्य यह है कि संस्कृति आन्तरिक ऊर्जा की प्रतीक हुआ करती है, तो सभ्यता बाह्य आचरणों-व्यवहारों की।
भारतीय संस्कृति सभ्यता : भारतीय संस्कृति अपनी अन्तः प्रेरणा एवं आन्तरिक ऊर्जा के स्तर पर अपनी सम्पर्ण सादगी से भी। बडी प्राणवान रही है, यह एक सर्वमान्य तथ्य है। उसकी दृष्टि जितनी परलोकोन्मुख रही, उतनी लोकोन्मुख नहीं।  इस कारण ही भारत ने दर्शन और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में जितनी प्रगति और विकास किया, भौतिक क्षेत्रों में उस सीमा तक सम्भव नहीं हो सका, यद्यपि पीछे किसी से नहीं रहा। सादगी, आचरण-व्यवहार की पवित्रता, अहिंसा, अस्तेय और धीरज आदि भारतीय सभ्यता-संस्कृति के महत्त्वपूर्ण गुण और विश्व के लिए उपहार स्वीकारे गए हैं। समन्वय-साधना भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण देन है। इसी के बल पर भारत में तरह-तरह के दर्शन और सम्प्रदाय पनप सके, विदेशी तक आश्रय एवं अपनत्व पाने के अधिकारी बन सके। अनेक में एक और एक में अनेक के दर्शन करना भी भारतीय संस्कृति-सभ्यता की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
प्रेम और भाईचारे का पाठ भी सरे विश्व में फैलाना, दृढ़ता से उन सभी की साधना करना, स्वहित-साधन से बढ़ कर परहित-साधन और परोपकार को महत्व देना, अतिथि के देव-समान पूज्य एवं आदरणीय मानना, शरणागत की रक्षा प्राण-पण से करना जैसी अन्य कई विशेषताएँ भारतीय संस्कृति-सभ्यता से बाहर कहाँ मिलती हैं। “सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिदुख भागभवेद्” जैसे मंत्र विश्व को केवल भारतीय सभ्यता-संस्कृति ही प्रदान कर सकती थी। इसी प्रकार के अन्य अनेक तत्त्वों एवं महत्त्वों का भी नामोल्लेख किया जा सकता है जो केवल यहीं पाए जाते हैं।
उपसंहार : सम्पूर्ण विश्व जानता है कि भारतीय सभ्यता-संस्कति को नष्ट करने के अनेक प्रयत्न होते रहे, आज भी निरन्तर हो रहे हैं। फिर भी यह संस्कृति परजीवित है, तो अपनी आन्तरिक ऊर्जा के बल पर ही आगे भी जीती रहेगी; किन्तु खेद के साथ स्वीकाना पड़ता है। कि आज इसके पोषकों के आचरण-व्यवहार में पहले वालो ऊर्जस्विता नहीं रह गई। आज का भारत अपने मल्यों-मानों को अपनी जड़ों से काट कर अधिकाधिक उधार की संस्कति से प्रभावित एवं अनुप्राणित होता जा रहा है। इस सब को किसी भी दृष्टि से भविष्य के लिए शुभ एवं हितकर नहीं कहा जा सकता।

Post a Comment

0 Comments