अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष

प्रस्तावना : आधुनिक नारी पर यह लक्षण पूर्णतः घटित होते हैं। वैसे सृष्टि के आदि काल से भारतीय नारी में पृथ्वी की-सी क्षमा, समुद्र-सी गम्भीरता, चन्द्रमा-सी शीतलता, सुर्य-सा तेज़ और पर्वतों जैसी मानसिक उच्चता एक साथ देखी जा सकती हैं। वह क्षमा, दया, ममता और प्रेम की पावन मूर्ति है और आवश्यकता पड़ने पर वह रणचण्डी का भी रूप धारण कर सकती है। स्त्री और पुरुष समाज रूपी गाडी के दो चक्र हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। वह पत्नी रूप में परामर्शदात्री और माता रूप में हमारी गुरु है। बाल्यकाल से वृद्धावस्था तक नर । नारी का ऋणी है। इसीलिए कालिदास ने उसे, ‘गृहिणी सचिवः प्रिय सखी:’ कहा है।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष की घोषणा : विश्व का मानव आज फिर से महिला के गुणों का मूल्यांकन कर उसके विकास एवं उत्थान की कल्पनाएँ करने लगा है। इसी परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशन पर सन् 1975 का वर्ष विश्व के सभी देशों में ‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष’ के रूप में मनाया गया है। विश्व के सभी देशों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुरूप वहाँ की महिलाओं की समस्याओं के समाधान खोजे हैं। हमारे भारत देश में भी सौभाग्य से ‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष’ की बड़ी धूम रही। महिलाओं के सुधार के लिए भारतीय राहिला परिषद्, महिला समाज और महिला मण्डल आदि अनेक संस्थाएँ खोली गईं, जिनमें अनेक विकासात्मक कार्य हुए।
सामाजिक स्थिति के सुधार में महिलाओं का योग : बच्चे की प्रथम पाठशाला घर और विशेष रूप से माँ है। 21 जुलाई 1975 को अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के अवसर पर उत्तर प्रदेश राज्य कल्याण परिषद् द्वारा आयोजित गोष्ठी का उद्घाटन करते हुए भूतपूर्व मुख्यमन्त्री श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधार पर प्रकाश इन शब्दों में डाला, “परिवार के खर्च के लेखा-जोखा से लेकर बच्चों की उचित ट्रेनिंग तक में हमारी महिलाओं का महत्त्वपूर्ण योग है। अत: सामाजिक दृष्किोण के परिवर्तन में महिलाओं को प्रमुख मिका अदा करने का अवसर मिलना चाहिए। यह कहना अनुचित कि महिलाओं को देश में उचित सम्मान नहीं मिलता। वरन हमारे देश में सामाजिक मामलों में महिलाओं की भूमिका का उन देशों से। भी अधिक महत्त्व है, जो आगे बढ़े हुए कहे जाते हैं। इसलिए महिलाओं को देश में आत्मविश्वास जाग्रत करना चाहिए। महिलाओं में दृढ़ संकल्प लेने की क्षमता होती है।” वस्तुत: हमारी सामाजिक परम्पराओं से यही विदित होता है कि हम महिलाओं के प्रति सर्वदा सहिष्णु रहे हैं। हमारी सभ्यता में पिता और भाई भी अपनी पुत्री व छोटी बहन तक के पैर छूते हैं। जननी के रूप में एक महिला की स्थान कितना ऊँचा होता है। यह विश्व में कौन नहीं जानता, ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ जैसे विचार सुनकर हमारा हृदय माँ के प्रति श्रद्धालु हो उठता। है क्यों न हो, क्योंकि-
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि माता कुमाता न भवति ।’
श्रीमती जगदीश कौर के अनुसार, “युद्ध में लड़ने वाले पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने समाज का ज्यादा भला किया है। किसी भी। महान् महिला की कहानी धैर्य और आत्म-विश्वास की कहानी है। कम से कम कुछ क्षेत्रों ने औरतों की महत्ता स्वीकार की है; परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष की सफलता में मुझे संदेह है। गाँवों की महिलाएँ। वैसी ही हैं, जैसी पहले थीं। आज रेल आदि में सफर करने वाली महिलाओं की सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए।
समानता का अधिकार : आज भारत में नारी को संविधान द्वारा समानता का अधिकार प्राप्त है। वह न केवल मतदान का ही अधिकार रखती है; बल्कि बड़े से बड़े पद पर अपने को प्रतिष्ठित करने का भी अधिकार रखती है। भूतपूर्व मुख्यमन्त्री श्री चरणसिंह की पत्नी श्रीमती गायत्री देवी, विधायिका उ०प्र० के मतानुसार महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से समानता का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। डॉ० श्रीमती रजिया हुसैन का मत है कि महिलाएँ बौद्धिक दृष्टि से पुरुषों के समान हैं यद्यपि शारीरिक दृष्टि से वे कुछ कमजोर होती हैं। महिलाएँ प्रायः वे सभी काम कर सकती हैं जो पुरुष करते हैं। कु० राजमोहिनी स्याल के मत से, “महिला को अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए। पति की सम्पत्ति पर समान अधिकार होना चाहिए। मेहरबानो का कहना है कि मेरे ख्याल में अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष समिति इस माने में अच्छा कार्य कर रही है कि वह महिलाओं की समस्याओं को सामने ला रही । है और उनको बराबरी का स्थान दिलाने के लिए लड़ रही है। इसके विपरीत कु० नीना श्रीवास्तव, रेडियो एनाउन्सर के विचार हैं कि महिला पुरुष के बराबर कभी नहीं हो सकती; क्योंकि प्रकृति ने उसे बनाया। ही वैसा है। पुरुष के बराबर नौकरी करने की बात व्यर्थ हो; क्योंकि शारीरिक दृष्टि से वे हर काम के लिए उपयुक्त नहीं हैं। वास्तव में आधुनिक महिलाएँ ‘महिला वर्ष’ को न जाने किस रूप में देख रही  हैं। क्या वे मुक्ति हर क्षेत्र में पुरुष से स्पर्धा करने के लिए चाहती हैं ? पुरुषों के साथ बराबरी का नारा लगाना उन्हें शोभा नहीं देता। बराबरी की बात तो कोई तब सोचे जब वह नीचा हो जो स्वयं उच्च स्थान पर अधिष्ठित है, उसे अपनी गरिमा को नहीं भूल जाना चाहिए। शास्त्रों में महिला, केवल पत्नी रूप में कुछ स्थितियों में अनुचरी एवं अनुगामिनी कही गई है; किन्तु अधिकतर उसका रूप यहाँ पर भी सहधर्मिणी का ही है। शारीरिक रूप से कोमल एवं निर्बल होने के कारण उसका पति के अनुशासन में रहना उचित भी है। वास्तव में पति-पत्नी को आपस में मिलकर एक मत होकर कार्य करना चाहिए।
महिला शिक्षा का प्रचार : माँ की एक बात पुत्र के हृदय पर पत्थर की लकीर बन जाती है। देश के भावी राष्ट्र कर्णधारों के निर्माण के लिए नारी-शिक्षा का बड़ा महत्त्व है। शिक्षा के अभाव में गिरिधर कविराय के शब्दों में फूहड सिद्ध होगी-
काची रोटी कुच-कुची, परती माछौ बार।
फूहर वही सराहिए, परसत टपकै लार।’
शिक्षा का लक्ष्य नौकरी नहीं ऐसी शिक्षा तो गुप्त के शब्दों में निषिद्ध है।
शिक्षे तुम्हारा नाश हो, नौकरी के हित बनी 
उत्तर प्रदेश की भूतपूर्व समाज एवं हरिजन कल्याण मंत्री श्रीमती मोहसिना किदवई ने अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष में महिलाओं को व्यावहारिक शिक्षा के प्रशिक्षण पर बल दिया। आज नारी शिक्षा को बेगम हमीदा हबीबुल्ला, कु० शशि दीक्षित आदि सभी ने एक मत से स्वीकार किया। में भी कहता है कि नारी शिक्षित हो; पर वह सभा की परी न हो, खातून खाना हो ।
बहु विवाह तथा दहेज प्रथा का विरोध : भारतीय समाज में सभी जातियों व धर्मों में नारी पुरुष के विवाह के समान अ प्रकार होने चाहिए। कुछ सम्प्रदायों में पुरुषों को चार-चार विवाह तक करने की छुट है। जब चाहे पुरुष नारी को छोड़ दे । नारी की मृत्यु र पुरुष तो विवाह कर सकता है। नारी नहीं।  आज कुछ लोग अपने बच्चों को बेचते जैसे हैं और कन्या पक्ष से इतना अधिक दहेज माँगते है कि कन्या के माता-पिता लड़की को अभिशाप समझ लेते हैं। आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष में कु० स्याल एडवोकेट के शब्दों में, “सरकार कडा कानून बनाकर दहेज लेने और देने को दण्डनीय अपराध घोषित कर दे। पाकिस्तान की स्नातक महिलाओं की संस्था ने माँग की है कि ऊँचे पदों पर तैनात नेताओं को यह शपथ लेनी चाहिए कि वे एक से अधिक विवाह नहीं करेंगे।
सरकार द्वारा किये गये कार्य : सरकारी स्तर पर कुछ विशिष्ट एवं संभ्रांत कही जाने वाली महिलाओं के सहयोग से केन्द्र तथा प्रदेश स्तर की कमेटियाँ बनीं। इन कमेटियों की गतिविधियाँ भाषण, सरकारी रेकार्ड तथा समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई। बरेली जनपद के महिला चिकित्सालय में महिला वन्ध्याकरण शिविर की स्थापना कर देश की वर्तमान परिवार वृद्धि समस्या का समाधान किया गया। शमीम रहमानी जैसी महिलाओं का आजन्म कारावास का क्षमादान भी इस अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति द्वारा दिया गया। यद्यपि श्रीमती संचय लता जैसी नारियों ने इसका विरोध भी किया कि इससे महिला जाति को गलत प्रोत्साहन मिला है। स्व० श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने गुजरात चुनाव के सन्दर्भ में अपने भाषणों में पुरुषों द्वारा महिलाओं के प्रति किए जाने वाले व्यवहार पर गहरा रोष और आक्रोश भी व्यक्त किया था; लेकिन उर्मिला देवी, पीलीभीत की यह शिकायत है कि स्वयं श्रीमती । इन्दिरा गाँधी ने इस महिला वर्ष में महिलाओं के सामाजिक उत्थान के लिए क्या किया है ? इसी स्वर में श्रीमती आनन्दबाला सेठ ने स्वर मिलाया, “अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के बारे में प्रचार कार्य बहुत कमज़ोर है और जब इसी मामले में कमजोरी है तो भला महिलाएँ इस विषय में कैसे जागरूक होंगी।” सरकार ने महिला डाकघर तथा डाक टिकट इस अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के उपलक्ष्य में जारी किए हैं।
उपसंहार : यद्यपि धर्म प्रधान भारत देश की नारी का जीवन कुछ बातों में विदेशी नारियों के लिए भी आदर्श है। वे आधार पतिभक्ति, प्रेम, समाज-सेवा तथा राजसेवा आदि हैं। राधा का प्रेम, यशोदा माता की ममता, द्रौपदी की निष्ठा तथा सीता का त्याग सराहनीय है। ईरान की राजकुमारी अशरफ पहलवी ने अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के कार्यक्रमों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को 10 लाख डालर की धनराशि देकर त्याग का अच्छा परिचय दिया था; किन्तु अयोध्या की डकैती में एक महिला पकड़ी गयी। वास्तव में ऐसी नारियाँ महिला वर्ष को ‘मैला वर्ष’ बना। रही हैं। आधुनिकता के नाम पर धूम्रपान, शराब पान व अन्य व्यसन आज की महिलाएँ त्याग दें; तो वास्तव में पूज्या हैं तथा उनका आदर्श अनुकरणीय भविष्य अति उज्ज्वल है। आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष । पर विश्व की प्रत्येक महिला को स्वकर्तव्य पालन का व्रत लेना चाहिए। इसी में इस महिला वर्ष की सार्थकता है।

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