रेलवे प्लेटफार्म का दृश्य

एक दिन संयोग से मुझे अपने बड़े भाई को लेने रेलवे स्टेशन पर जाना पड़ा । मैं प्लेटफार्म टिकट लेकर रेलवे स्टेशन के अन्दर गया । पूछताछ खिड़की से पता लगा कि ल्ली से आने वाली गाड़ी प्लेटफार्म नं० 4 पर आएगी । मैं रेलवे पुल पार करके शेटफार्म नं० 4 पर पहुँच गया । वहां यात्रियों की काफ़ी बड़ी संख्या मौजूद थी । कुछ गि मेरी तरह अपने प्रियजनों को लेने के लिए आये थे तो कुछ लोग अपने प्रियजनों को गाड़ी में सवार कराने के लिए आये हुए थे । जाने वाले यात्री अपने-अपने सामान के पास हे थे । कुछ यात्रियों के पास कुली
भी खड़े थे । मैं भी उन लोगों की तरह गाड़ी की तीक्षा करने लगा । इसी दौरान मैंने अपनी नजर रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ाई । मैंने देखा क अनेक युवक और युवितयाँ अत्याधुनिक पोशाक पहने इधर-उधर घूम रहे थे । कुछ पृषक तो लगता था यहाँ केवल मनोरंजन के लिए ही आए थे । वे आने-जाने वाली लड़कियों, औरतों को अजीब-अजीब नज़रों से घूर रहे थे । ऐसे युवक दो-दो, चार-चार के ग्रुप में थे । कुछ यात्री टी-स्टाल पर खड़े चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, परन्तु उनकी अक्षरे बार-बार उस तरफ उठ जाती थीं, जिधर से गाडी आने
वाली थी। कुछ यात्री बडे आराम से अपने सामान के पास खड़े थे, लगता था कि उन्हें गाड़ी आने पर जगह प्राप्त करने की कोई चिन्ता नहीं । उन्होंने पहले से ही अपनी सीट आरक्षित करवा ली थी । कुछ फेरी वाले भी अपना माल बेचते हुए प्लेटफार्म पर घूम रहे थे । सभी लोगों की नजरें उस तरफ थीं जिधर से गाड़ी ने आना था । तभी लगा जैसे गाड़ी आने वाली हो । प्लेटफार्म पर भगदड़ सी मच गई । सभी यात्री अपना-अपना सामान उठा कर तैयार हो गये । कुलियों ने सामान अपने सिरों पर रख लिया । सारा वातावरण उत्तेजना से
भर गया। देखते – ही देखते गाड़ी प्लेटफार्म पर आ पहुँची । कुछ युवकों ने तो गाड़ी के रुकने की भी प्रतीक्षा न की । वे गाड़ी के साथ दौड़ते-दौड़ते गाड़ी में सवार हो गये । गाड़ी रुकी तो गाड़ी में सवार होने के लिए धक्कम-पेल शुरू हो गयी । हर कोई पहले गाड़ी में सवार हो जाना चाहता था। उन्हें दूसरों की नहीं केवल अपनी चिन्ता थी। मेरे भाई मेरे सामने वाले डिब्बे में थे । उनके गाड़ी से नीचे उतरते ही मैंने उनके चरण स्पर्श किये और उनका सामान उठाकर स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ा । चलते-चलते मैंने देखा जो लोग अपने प्रियजनों को गाड़ी में सवार कराकर लौट रहे थे उनके चेहरे उदास थे और मेरी तरह जिनके प्रियजन गाड़ी से उतरे थे उनके चेहरों पर रौनक थी, खुशी थी ।
एक दिन मुझे अपने मित्र के साथ रेलवे स्टेशन पर जाना पड़ा। हम प्लेटफार्म टिकट लेकर रेलवे स्टेशन के अन्दर चले गए। पता चला कि दिल्ली से आने वाली गाड़ी प्लेटफार्म 2 पर आ रही है। मैं जल्दी-जल्दी सीढ़ियां पार करता हआ प्लेटफार्म नं02 पर पहुंचा। यात्रियों को भीड़ देखकर मैं दंग रह गया। कुछ लोग तो अपने प्रियजनों का स्वागत करने आए हुए थे और कुछ लोग अपने प्रियजनों को गाड़ी पर बैठाने के लिए आए थे। गाड़ी पर सवार होने वाले यात्री अपने-अपने सामान लिए खड़े थे। कुली भी इधर-उधर भागते नजर आ रहे थे। अन्य लोगों की तरह मैं भी गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा। प्लेटफार्म पर अनेक युवक-युवतियां आधुनिक पौशाक पहने घूम रहे थे। मानो ऐसा लगता था कि वे मनोरंजन करने आए हों। कुछ युवक दो-दो, चार-चार ग्रुप में खड़े थे और औरतों को अजीव ढंग से देख रहे थे। कुछ यात्री टी० स्टाल पर चाय की चुस्कियां ले रहे थे। सबकी नजरें बार-बार उसतरफ उठ रही थीं, जिधर से गाड़ी ने आना था। कुछलोग तो ब्रेफिक्र अपने सामान के साथ खड़े थे क्योंकि उन्होंने अपनी सीटें आरक्षित करवा रखी थी। फेरी वाले अपने-अपने सामान को बेचते हुए नजर आ रहे थे। कुछ समय पश्चात् प्लेटफार्म पर भगदड़ सी मचने लगी। सभी यात्री अपना-अपना सामान उठाकर तैयार हो गए। देखते-ही-देखते गाड़ी प्लेटफार्म पर आ पहुंची। कुछ युवक तो दौड़ते-दौड़ते ही गाड़ी पर सवार हो गए। गाड़ी रुकने पर लोगों में धक्कम-पेल शुरू हो गई। प्रत्येक पहले गाड़ी में सवार होना चाहता था। कुछ क्षणों बाद मैंने अपने बड़े भाई को गाड़ी से उतरते देखा और झट से मैंने उनके चरण स्पर्श किए। भाई साहब का सामान उठाकर मैं स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ा। मैंने देखा वहाँ जो प्रियजनों के लेने आए थे उनके चेहरों पर रौनक थी और जो अपने प्रियजनों को गाड़ी पर सवार करने आए थे उनके चेहरे उदास थे।

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