दहेजप्रथा – एक सामाजिक कलंक

आज हमारे विकासशील देश के सामने अनेक समस्याएँ हैं। यहाँ जितने धर्म-सम्प्रदाय हैं उतनी ही उनकी प्रथाएँ हैं। यदि हम इन प्रथाओं के उद्भव तथा विकास का अध्ययन करें तो पता चलता है कि इन प्रचलित प्रथाओं के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य रहा होता है। लेकिन बाद में ये प्रथाएँ रूढ़ि बन जाती हैं जिनसे मुक्ति पाना असम्भव-सा हो जाता है। कुछ प्रथाएँ तो हमारी संस्कृति की धरोहर हैं तथा कुछ प्रथाएँ तो हमारे समाज के लिए कलंक बन गई हैं। उन्हीं प्रथाओं में एक प्रथा है-दहेज-प्रथा, जोकि हमारे समाज के लिए एक प्रमुख समस्या बन गई है। कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को दान अथवा उपहार के रूप में जो वस्तुएँ दी जाती हैं उसे ‘दहेज’ कहा जाता है।
भारत में यह प्रथा प्राचीनकाल से ही प्रचलित है। प्राचीनकाल में राजा-महाराजा अपनी पुत्री को सभी सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिए दहेज देते थे। बाद में यह प्रथा ही बन गई। छोटे-बड़े सभी लोग दहेज देने लगे और अब यही प्रथा समस्या बन गई है।

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