उदारीकरण का जनता पर प्रभाव

एक राष्ट्र के अस्तित्व के लिए नागरिकों का होना बहुत अनिवार्य है। बिना नागरिकों के किसी भी राष्ट्र का कोई भी औचित्य नहीं हो सकता। अतः एक राष्ट्र से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों के हितों को ध्यान में रखकर अपनी राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का गठन करे। जिससे उनका पूरा विकास संभव हो सके। केवल भौतिक अथवा आर्थिक हितों को ही ध्यान में नहीं रखा जाये। 1990 में मानव विकास की प्रथम रिपोर्ट में यह बात उजागर हुई थी तथा ‘संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ की रिपोर्ट ने भी उदारीकरण के संदर्भ में अपनी ऐसी ही राय व्यक्त की थी। वैसे तो अनेक देशों ने विकास किया लेकिन कुछ देश उससे अछूते भी रह गये हैं। ‘यू.एन.डी.पी.’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में राष्ट्र की प्रगति अथवा विकास का पैमाना सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बजाय मानव विकास सूचकांक को माना गया है। जिसकी तीन कसौटियाँ हैं- शिक्षा, प्रति व्यक्ति आय और दीर्घायु।
विकास का लाभ सभी वर्ग के लोगों को समान रूप से मिल सके, इसके लिए प्रभावी शासन प्रणाली होनी चाहिए। उसके लिए सही संचालन की आवश्यकता होती है।

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